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देशी गाय व विदेशी गाय Leave a comment

स्वदेशी गऊ आधारित उपार्जन एवं स्वदेशी गऊ की उपयोगिता

पिछले लगभग 200 वर्षाें से स्वदेशी गऊ संरक्षण व संवर्धन गौशालाओं पर आधारित होता गया और साधारण गऊपालक को उसके हाल पर छोड़ दिया गया। कुछ कुप्रचारित अफवाहों के आधार पर देशी गऊ मांँ का अधिकार बर्बाद होने लगा। साथ ही 1966 के गौवध विरोधी आन्दोलन के 50 वर्ष बीतने के बाद भी वांछित स्तर के परिणाम प्राप्त नही हुए। यह तो नही कहा जा सकता कि कुछ नही हुआ लेकिन आवश्यकता और अपेक्षा के अनुरूप प्रगति नही हुई। इसके परिणामस्वरूप देश की जनसंख्या तो बढ़ी परन्तु उसके हिसाब से गौ का महत्व उल्टा कम होता गया। कुछ लोगों की साधना है कि स्वदेशी गऊ वंश स्वयं एक ऐसा उपार्जन केन्द्र है जिसमें न सिर्फ गौवंश का संरक्षण, संवर्धन, गौ हत्या निवारण निहित है बल्कि इसके साथ समाज में आर्थिक योगदान, पाॅजिटिव एनर्जी व देश समाज का उत्थान भी अनिवार्यतः संभव है।

इस लेख का उद्देश्य जनसाधारण के अतिरिक्त विशेष रूप से कुछ हिन्दू साधक जो अपने आपको देशी गौव्रती या जिन्होंने देशी गौ का गव्य पदार्थ मात्र उपयोग करने का संकल्प लिया है, के लिए है। देशी गऊ व्रत तो ले लिया गया परन्तु इसके लिए आवश्यक उपकरण, वस्तुऐं एवं गौ माँ उपलब्ध नही हो पाई। कुछ प्रयास हुए परन्तु वह भी वांछित स्तर पर नही पहुंचे और गा सेवा का पर्याय गौशाला में बगैर दूध वाली गाय का संरक्षण मात्र रह गया। आज भी आवश्यकता होने पर देशी गऊ व गव्य पदार्थ उपलब्ध नही होते। इनके अभाव में देशी गौव्रत का पालन करना बेहद कष्टदायी हो जाता है। अतः समय की आवश्यकता है कि समाज व्यापारिक स्तर पर देशी गऊ संवर्धन एवं पंचगव्य द्वारा देशी गौ प्रगति की ओर ध्यान दें। जितने अधिक संस्थान खुलेंगे, जितना अधिक उत्पादन होगा उतना ही सहज देशी गौ महात्म बन पायेगा। इस बीच बहुत कुछ बदलाव हुये हैं और बहुत कुछ होना बाकी हैं। इस हेतु अपने कुछ विचार प्रस्तुत हैं-

देशी गऊ पंचगव्य उपार्जन द्वारा गौवंश संवर्धन, संरक्षण – हिन्दू समाज की विरोधाभासी धारणाऐं

हिन्दू के लिए गाय का नाम आते ही एक स्वरूप उभरता है मां का, धर्म का, समाज का, देश का, परमात्मा का परन्तु आर्थिक विडम्बनाओं के चलते हिन्दू अकेली श्रद्धा के रूप में अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेता है। सिर्फ मंदिर में मूर्ति के लिए माला, प्रसाद और अन्य उपहार देकर लौकिक-पारलौकिक लाभ प्राप्त करना चाहता है। गाय को एक रोटी खिलाकर, गाय के लिए कुछ दान देकर, गौशालाओं, गौ ऋषियों, गौसेवक एवं संतों-महंतों को दान करके पुण्य प्राप्ति की कामना करता है। उस समय यह भूल जाता है कि गऊ मां जीवित जीवंत प्राणी है जिसकी जीवन की आवश्यकताऐं हैं। यह क्रम लगातार चलते हुए मां को मां के स्थान पर दान-दया की अधिकारिणी मानकर श्रद्धा करता है परन्तु मां को उसका आर्थिक अधिकार देने के लिए तत्पर नही है। हम अगर मां को श्रद्धा एवं धर्म से अतिरिक्त प्रथमतः जीवंत रूप में व्यवहारिक, आर्थिक अवलम्बन खोजकर उसे मूर्त रूप दें तभी देशी गऊ की विरासत बचेगी। इस विरासत को हम व्यवहार में मां के लिए नही अपने लिए आर्थिक उपादेयता प्राप्त कर लें तो यह जनजीवन में कल्चर बन जायेगा। इस कल्चर द्वारा देशी गौवंश का आज की एवं भविष्य की पीढ़ियों के लिए अनुपम योगदान होगा।

हम कुछ विडम्बनाओं पर चर्चा करेंगे और उन विडम्बनाओं के लिए समाज में क्या रास्ता, क्या क्रम बनाया जाये? यह किसी भी समय हिन्दू समाज को, भारतीय समाज को स्वीकारना ही पड़ेगा। इस साधक जीवन की 17 वर्ष की साधना हैः स्वदेशी गऊ वंश स्वयं एक ऐसा उपार्जन केन्द्र है जिसमें न सिर्फ गौवंश का संरक्षण, संवर्धन, गौ हत्या निवारण निहित है बल्कि इसके साथ समाज में आर्थिक योगदान, पाॅजिटिव एनर्जी व देश समाज का उत्थान भी अनिवार्यतः संभव है। देशी गौ का पंचगव्य एवं अन्य गव्य पदार्थों द्वारा पूंजी का विनियोजन आर्थिक रूप से किसी भी अन्य व्यवसाय से अधिक लाभदायिक सिद्ध है परन्तु पंूजी और प्रयास को श्रद्धा एवं विश्वास के साथ लगाना होगा। इसकी संभावनाऐं हैं, आवश्यकता है इनकी पूर्ति की।

विडम्बना नं. 01 – देशी – विदेशी गाय

;पद्ध पिछले 100 वर्ष में यह प्रचारित हो गया कि गाय तो गाय है क्या देशी क्या विदेशी? यह सुविचारित षड़यंत्र हिन्दू की आस्था को कमजोर करने के लिए लाया गया और विडम्बनावस भारतीय समाज में इसे स्वीकार भी कर लिया। विदेशों में । 1 दूध को हानिकारक और देशी गाय के । 2 दूध को लाभदायक सिद्ध किया गया परन्तु व्यवहारिकता में उच्चतर उपादेयता के बाबजूद देशी गाय के दूध, दही, घी, मिल्क पाउडर आदि का मूल्य देते समय तुलनात्मक अधिक मूल्य देने की मनाही की जाती है यह देशी गौ संरक्षण, गौ संवर्धन के लिए घातक ही नही मारक भी है। आखिर कब तक हम अपनी विरासत की उपयोगी वस्तुओं का आर्थिक निरादर करते हुए उनका अस्तित्व समाप्त करने केे लिए तैयार रहेंगे और किसी भी प्रकार का कोई प्रयास जन-मानस नही करेगा मूक दर्शक बना रहेगा। अब समय आ चुका है कि हमें अपनी विरासत व धरोहर को संकीर्ण विचारों को छोड़कर विकासशील भविष्य के लिए कार्य करना होगा और इसके लिए देशी गौ गव्यों का समुचित उचित मूल्य देकर बढ़ा हुआ मूल्य देकर आगे बढ़ना होगा।

;पपद्ध विदेशी गाय मानव द्वारा प्रशंसकारित जीव है जिसको पश्चिमी देशों के वैज्ञानिकों ने अधिक मांस, अधिक दूध के लिए विकसित किया। विदेशों में विदेशी गाय को देशी गाय से अलग माना जाता है। विदेशी गाय को एक्सोटिक गाय कहते हैं और देशी गाय को ब्रह्मा गाय के नाम से देश-विदेश में जाना जाता है। दोनों के रूप, गुण, स्वभाव आदि अलग हैं। देशी गाय में उठा हुआ कुकुद होता है विदेशी में गर्दन सफा-चट बिना उठाव के होती है। देशी गाय की झालर के नीचे लटकने वाली लम्बी होती है देशी गाय में सूर्य केतु नाड़ी होती है जो विदेशी गाय में नही होती। देशी गाय की आंत की लम्बाई विदेशी गाय की आंत की लम्बाई से अधिक होती है। देशी गाय के गोबर मंे फाइबर की मात्रा विदेशी गाय से 5-6 गुना अधिक होती है। पंचगव्य केवल देशी गाय से बन सकता है देशी गाय की उपस्थिति शुद्ध, सात्विक, पाॅजिटिव एनर्जी वाली होती है। देशी गाय मां है और मां के रूप में औषधियुक्त मातृत्व ;पंचगव्यद्ध प्रदान करती है। अनेक शोध देशी गाय की उच्चता एवं उपयोगिता को प्रदर्शित करते हैं। देशी गाय के दूध, दही के पदार्थ में बैक्टीरियल डेवेलपमेंट विदेशी गाय से अधिक होता है। अतः सनातन देशी गाय अधिक मूल्य देकर भी स्वीकार्य होनी चाहिए। विदेशी गाय अधिक दूध देने के बाद भी त्याज्य होनी चाहिए।

देशी गौवंश सनातन धर्म की सनातन परंपरा में कामधेनु, नंदिनी, भगवान शंकर के वृषभ नंदी, भगवान कृष्ण की आराध्या देशी गऊ है।

  • विदशों में विदेशी गाय उसके मांस (बीफ) के लिए पाली जाती है और दूध उसका गौढ़ उत्पाद है। अतः विदेशों में विदेशी गऊ वंश की उपयोगिता दूध पर से समाप्त या कम होते ही उसका मांस प्राप्त एवं उपयोग कर लिया जाता है। अध्ययन से पता चलता है कि विदेशों में गौ पालन फार्म्स की 90 प्रतिशत से अधिक आमदनी बीफ के द्वारा होती है जबकि देशी गाय को बीफ के लिए पाला जाना भारतवर्ष में असंभव है। अतः यह विचारणीय प्रश्न है कि गौ हत्या बंदी में विदेशी गाय को शामिल न किया जाये केवल देशी गौ हत्या बंदी हो। यह विदेश की स्थिति व देश की स्थिति की विडम्बना है कि देश के सिकुड़ते हुए संसाधनों में विदेशी गाय देशी गाय का हिस्सा ले इससे उलट विदेशी गाय का स्वभाविक प्रयोग जो विदेशों में होता है, बीफ के लिए किया जाये।
  • देशी गौवंश पर हुए शोध का अकसर जिक्र होता है। सुनते समय बहुत प्रशंसा होती हैश् इसके द्वारा गाय का महत्व बढ़ता है। अधिकतर शोध अत्यंत उपयोगी हैं परन्तु गौ के अर्थिक अवलम्बन में बहुत थोड़ा ही योगदान कर पाते हैं और गव्य पदार्थ की बहुत कम ही मात्रा उपयोग हो पाती है। इसको एक उदाहरण के माध्यम से समझें। यदि हमारे देश में 7 करोड़ देशी गौवंश हैं तो इनका प्रतिदिन 40 करोड़ किलो (4 लाख टन) गोबर प्राप्त होना चाहिए। आवश्यकता ऐसी कल्चर की है कि इसका 75 प्रतिशत से भी अधिक उच्च आर्थिक मूल्य प्राप्त करें। इस गौवंश पर यदि पचास रूपया प्रतिदिन खर्चा हो तो रू. 350 करोड़ प्रतिदिन होता है यदि गोबर मूल्य रू. एक प्रति किलो प्राप्त होता है तो रू. चालीस करोड़ प्रतिदिन मिला इसको पांच रूपया किलो से रू. 200 करोड़ प्रतिदिन का कन्ट्रीव्यूशन तो देना ही चाहिए। अतः गौवंश बचाने के लिए गव्य पदार्थों के खर्च के समकक्ष मूल्य तो मिलना ही चाहिए। शोध द्वारा इसकी संभावना सिद्ध है अब है इसपर कार्य होने की बारी।
  • मानकीकरणः गव्य औषधियों का निर्माण कुटीर उद्योग के रूप में हो रहा है। अतः देश, काल, परिस्थिति के अंतर्गत औषधियांे का प्रभाव कम ज्यादा हो जाता है। इन औषधियों का निर्माण बड़े उद्योग के रूप में मानकीकृत होना चाहिए इसके द्वारा प्रसार, प्रसार व उन्नत उपयोग एवं शोध संभव होकर गव्यों के अधिक मूल्य से गौ संवर्धन, संरक्षण हो सकेगा।

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