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देशी गाय का दूध धरती पर अमृत Leave a comment

स्वास्थ्य से समझौता कैसा। देशी गाय का A 2 दूध अमृत जैसा।

दूध जैसा पौष्टिक और अत्यंत गुणवत्ता वाला अन्य कोई ऐसा पदार्थ नही है। दूध मृत्युलोक का अमृत है। सभी दूधों में अपनी माँ का दूध श्रेष्ठ है और माँ का दूध कम पड़ा वहां से गाय का दूध श्रेष्ठ सिद्ध होता है।

गाय के दूध के तत्वः वर्तमान वैज्ञानिक मतानुसार गौदुग्ध में आठ प्रकार के प्रोटीन, इक्कीस प्रकार के एमीनो एसिड, ग्यारह प्रकार के चर्बीयुक्त एसिड, छः प्रकार के विटामिन, पच्चीस प्रकार के खनिज तत्व, आठ प्रकार के किण्वन, दो प्रकार की शर्करा, चार प्रकार के फाॅस्फोरस यौगिक और उन्नीस प्रकार के नाइट्रोजन होते हैं। विटामिन ए-1, केरोटिन डी-ई, टोकोकेराल, विटामिन बी-1, बी-2, रिवोफलेविन बी-3, बी-4 तथा विटामिन सी है। खनिजों में कैल्शियम, फाॅस्फोरस, लौह तत्व, ताम्बा, आयोडिन, मैगनीज, क्लोरिन, सिलिकाॅन मिले हुए हैं। एमिनो एसिड में लाइसिन, ट्रिप्टोफेन और हिक्वीटाइन प्रमुख हैं। दूध में जो कार्बोहाइड्रेट है उसमें लैक्टोस प्रमुख है जो पाचन तन्त्र को व्यवस्थित रखता है। लैक्टेज इत्यादि एन्जाइम, विटामिन ए, बी, सी, डी, ई और लैक्ट्रोकोम, क्रियेटिन, यूरिया, क्लोरीन, फाॅस्फेट, केसिनो मिश्रण इत्यादि मिलकर 100 से भी ज्यादा विशेष पदार्थ हैं। आधुनिक मतानुसार गौदुग्ध में विटामिन ए व कैरोटिन नामक पीला पदार्थ पाया जाता है जोकि अन्य दूध में नही है। यह रोग-प्रतिरोधक है जो आँख का तेज बढ़ाता है और बुद्धि को सतर्क रखता है। गाय का दूध पीले रंग का है जोकि सोने जैसे गुण परिलक्षित करता है। गौदुग्ध में 4.9 प्रतिशत शर्करा, 3.7 प्रतिशत घी व 11 प्रतिशत नाना प्रकार के एसिड हैं। 3.6 प्रतिशत प्रोटीन है जिसमें ल्युसन, ग्लूकेटिक एसिड, टिरोसीन, अमानिया, फाॅस्फोरस आदि 21 पदार्थ सम्मिलित हैं। 7.5 प्रतिशत पौटेशियम सोडियम इत्यादि ऐसे 17 रसायन हैं। इसमें पानी 87.3 प्रतिशत, वसा 4 प्रतिशत, कार्बोहाइड्रेट 4 प्रतिशत, ऊर्जा कैलोरी 6.5 प्रतिशत है। गाय के दूध में विटामिन ए-100 इन्टरनेशनल यूनिट, जो गरम कर मावा बनने पर 400 इन्टरनेशनल यूनिट हो जाता है।

गाय के दूध के गुणः गौदुग्ध अत्यन्त स्वादिष्ट, पौष्टिक, स्निग्ध, कोमल, मधुर, शीतल, रूचिकर, बुद्धिवर्धक, दस्त को बांधने वाला, स्तन्यजनन, अतिपथ्य, रसायन, बलवर्धक, स्मृतिवर्धक, रक्तवर्धक, तत्काल वीर्यवर्धक, बाजीकरण, स्थिरता प्रदान करने वाला, फुर्ती उमंग वर्धक, उत्साह, आशावादी दृष्टिकोण विकसित करने वाला, व्यस्थापक, अतिश्रम नाशक, ओज प्रदान करने वाला, देहकांति बढ़ाने वाला, रक्तपित्त शमन करने वाला, सर्वरोगनाशक अमृत के समान है।

अंगों को पुष्ट बनाकर अन्य अनेक रोग दूरः गौदुग्ध से मानव शरीर में कायाकल्पकर उसके सभी अंगों को पुष्ट बनाकर अन्य अनेक रोगों को नष्ट किया जाता है,कायाकल्प से नया जीवन मिलता है।

संतान लाभः संतान की इच्छा रखने वाली महिला गाय का श्रद्धापूर्वक पूजन, परिक्रमा कर पुष्य नक्षत्र के पावन दिवस से कपास के पौधे की कोमल जड़ (मूल) गाय के दूध में अच्छी तरह उबालें और उबले दूध को पीने योग्य ठंडा कर सात दिन तक सेवन करें। अल्पकाल में ही निश्चित गर्भावस्था को प्राप्त होगी। यदि पति पत्नी दोनों बछड़े वाली गाय का दूध पियें तो पुत्र प्राप्ति संभव है। कष्टार्तव को साफ करेगी।

गाय की रीढ़ः गाय की रीढ़ में ‘‘सूर्यकेतु’’ नाड़ी होती है जो सूर्य के प्रकाश में जागृत होती है इसलिए गाय सूर्य के प्रकाश में रहना पसंद करती है, भैंस छाया में रहती है। सूर्यकेतु नाड़ी के जागृत होने से स्वर्ण के रंग का वह एक पदार्थ छोड़ती है। इसी कारण गाय के दूध का रंग पीला होता है। गाय के दूध में स्वर्ण तत्व पाये जाते हैं जो दुनिया में मां के दूध के अलावा किसी पदार्थ में नही मिलते। जब रोग असाध्य एवं जीर्ण हो जाता है तो वैद्यराज स्वर्ण भस्म प्रयोग करते हैं।

गौदुग्ध अग्निउद्दीपक है, भोजन को पचाने वाला है, स्कन्ध मजबूत करता है। बच्चों की मांसपेशियों और हड्डियों के जोड़ मजबूत बनाता है। गौदुग्ध के प्रतिदिन सेवन करने वाला व्यक्ति को बुढ़ापा नही सताता है। वृद्धावस्था में होने वाली तकलीफों से मुक्ति मिल जाती है। गौदुग्ध से तुरन्त वीर्य उत्पन्न होता है। लम्बी बीमारी से त्रस्त व्यक्ति को नवजीवन मिलता है। गौदुग्ध शरीर में उत्पन्न होने वाले जहर का नाश करता है। एलापैथी दवाईयों, फर्टीलाइजर, रासायनिक खाद, कीटनाशक दवाईयों आदि से वायु, जल एवं अन्य के द्वारा शरीर में उत्पन्न होने वाले जहर समाप्त करने की क्षमता केवल गौदुग्ध में ही है। गौदुग्ध से प्रकृति सात्विक बनती है। व्यक्ति के प्राकृतिक विकार एवं विकृति दूर होती है। असामान्य और विलक्षण बुद्धि आती है।

गौदुग्ध में विद्यमान सेरिब्रोसाडस दिमाग एवं बुद्धि के विकास में सहायक है। केवल गौदुग्ध में ही स्ट्रोनटाइन तत्व है, जो आणविक विकारों के प्रतिरोधक है। गौदुग्ध से कोलेस्ट्रोल की वृद्धि नही होती है, बल्कि हृदय एवं रक्त प्रवाह में आने वाली बाधाओं को दूर करता है।

काली गाय का दूध शामक और सर्वाेत्तम है। खास करके वात्त का नाश करता है, लाल और चितकवरी गाय का दूध खासतौर से वातनाशक है। पीली गाय का दूध वातपित्त का नाश करता है। श्वेत गाय का दूध विशेष करके कफप्रद है। शिशु बछड़़े की माता का दूध तीनों दोष (वात्त, पित्त, कफ) का नाशकर्ता है; खली और सानी खाने वाली गाय का दूध कफप्रद है और कड़बा घास आदि खाने वाली गाय का दूध सभी रोगों में लाभप्रद है। जवान गाय का दूध मधुर, रसायन और त्रिदोषनाशक है। धूसर लाल गाय का अर्जुन के पत्ते खिलाकर दूध पीने से हार्ट मजबूत होता है। गौ माता के दूध में यह विशेषता है कि उसके पीने से शरीर में समस्त धातुऐं (रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि मज्जा, वीर्य) आवश्यकतानुसार बनती है। जबकि भैंस के दूध में मेद की अधिक वृद्धि होती है इससे मनुष्य अनावश्यक मोटा हो जाता है। मोटे मनुष्य में सहन शक्ति कम होती है व श्वास की गति बढ़ जाती है जिससे आयु कम हो जाती है।

शरीर के रोग, आमाशय के विकार (अन्नकोश की सड़न) गंदगी, रोग, कीटाणु, विषैली वायु और अणु सृष्टि से उत्पन्न होते हैं। गाय के दूध, दही में उत्तम और शक्तिशाली नित्र अणुओं की सृष्टि होती है। पैंतीस बूंद (एक क्यूबिक संेटीमीटर) दूध में लाखों व छाछ में करोड़ों ऐसे अणु रहते हैं जिनका काम रोगाणुओं को मार भगाना है,जीवाणुओं को खा जाने वाले जीव ;ठंबजमतपवचींहमेद्ध भी दूध दही में बहुत होते हैं।

कार्बोहाइड्रेट, फैट, अल्युमिनायड, क्षार तथा विटामिन होने के कारण मां व गाय का दूध लगभग बराबर है। अतः जो माताऐं नवजात शिशु को स्तनपान नही करा पाती, उन्हें अपने बच्चे को गाय का दूध पिलाने की सलाह डाॅक्टर देते हैं।

गाय के दूध में ब्युटिरिन व अन्य दूसरे कोमल तत्व अधिक मात्रा में रहते हैं इसलिये यह आसानी से पच जाता है। दूध की पाचकता/पाचक तत्वों को बरकरार रखने के लिए एक उबाल तक ही गरम करना चाहिए।

दूध के साथ खाने के अयोग्य पदार्थ मछली, मांस, मूत्र और मूली दूध के साथ नहीं खाना चाहिए। सब प्रकार के ऊष्ण पदार्थ (सब्जी के मसाले) तेल, सरसों, कैथ का फल, इस प्रकार के अन्य खट्टे फल दही, दही बड़ा, कढ़ी खीर, दूध के साथ नहीं खाना चाहिए। दूध जिसको दस्त, आंव, अतिसार, यकृत रोग हो तो अहितकर है।

दूध के साथ हितकर पदार्थः सहकार फल (आम), गोस्तनी (मुनक्का), मधु, घृत, मक्खन आदि। पिपरी, काली मिर्च, चीनी, सोंठ हर्रा और मधुर वर्ग के लिए सब पदार्थो के साथ दूध का सेवन हितकर है। अम्ल पदार्थ में आंवला, मधुर पदार्थ में शर्करा, कटुवर्ग में अदरक, कषाय रसयुक्त पदार्थो में यव दूध के साथ हितकर है।

मलाई: गुरु, शीतल, वीर्यवर्धक, पित्त और वातनाशक होती है। अग्नि को मन्द करने वाली तथा शीतल है।

धारोष्ण दूध के गुण: गाय का धारोष्ण दूध हितकर है। यह वात दोष से उत्पन्न रोगों को शान्त करने वाला है। पाण्डुरोग तथा कामला में हितकर है। पुष्टिकारक तथा क्षीण पुरुषों को ओजस्वी बना देता है। शरीर के दाह कर-पाद-नयन आदि की विदाह को हरने वाला, पित्त की अधिकता हरने वाला, अन्नपाचन संबंधी रोगों को जीतने वाला है।

पौष्टिक खाद्य पदार्थ: गाय के दूध से बने मक्खन के समान सर्वगुणसम्पन्न पौष्टिक खाद्य पदार्थ कोई दूसरा नहीं है।

गाय के दूध का औषधि रूप में उपयोग: कतिपय रोगों पर गौ दुग्ध के उपचार का संकलन निम्न प्रकार प्राप्त हुआ है:-

  1. धातु कमजोरी, नपंसुकता: अश्व गंधा चूर्ण खाने के बाद गौदुग्ध के सेवन से धातु कमजोरी, नपंसुकता आदि विकार दूर होते हैं। इसके नियमित सेवन से अपूर्व ताकत एवं वीर्य की वृद्धि होती है।
  2. पुष्टि, बल और वीर्यवृद्धि के लिए: गरम किए गए दूध में गाय का घी और शक्कर डालकर पीवें।
  3. जलोदर: रोगी सिर्फ गाय का दूध पीकर रहे तो रोग में सुधार होता है। औषधि साथ रखे रहें।
  4. शीतला आने पर/बुखार आने पर: शीघ्र दुहे गए दूध व घी का मिश्रण करके उसमें चीनी डालकर पिलाएं।
  5. मोतीझरा मेंः गाय के फटे दूध का पानी देने से आराम मिलता है
  6. तपेदिक: मिश्री 50 ग्राम, पिपली पिसी 10 ग्राम छानकर 250 दूध में उतना ही पानी मिलाकर काढ़ा तैयार करें। दूध बच जाने पर उसे उतार लें और 10-15 ग्राम गौघृत में 20-25 ग्राम शहद घोल लें। इसे इतना फेंटे कि दुग्ध में झांग पैदा हो जावे। इसे चूसते रहें और मन में विश्वास पैदा करें (भावना करें) कि आप स्वस्थ्य हो रहे हैं। फेंफड़ों में छेद भी होंगे तो वे भी भर जाएंगे।
  7. सर्दी के लिए: दूध गरम करके उसमें खड़ी चीनी व काली मिर्ची का चूर्ण या हल्दी का चूर्ण डालें और पिला दें। साथ में तुलसी पत्र और अदरक भी डाल सकते हैं।
  8. सर दुखने पर: गाय के दूध से सौंठ घिसकर माथे पर लेप करके उस पर रूई लगाएं। इसमें 7-8 मिनट पीड़ा अवश्य होगी परन्तु दुःख दूर हो जाएगा।
  9. नकसीर: एक कप उबले दूध में पुराने से पुराना घी डालें और कुछ पल नसवार की तरह सूंघें। जब दूध गुनगुना रह जाए तो मिश्री घोलकर पिएं।
  10. आधासीसी: गाय के दूध का मावा सूर्यादय से पहले मावे में सैंधानमक डालकर खायें उस दिन गौ दुग्ध पर रहें। गाय के दूध की खीर बादाम साथ में चीनी डालें।
  11. काँच का चूर्ण: गलती से अन्न के साथ खा जाए तो गाय के घी 2-3 चम्मच दूध में मिलाकर पीवें।
  12. आँखें जलती हों या आँखों का दर्दः इसके लिए गाय के दूध में रुई के दीवड़ बनाकर फिटकरी का चूर्ण डालकर आँखों पर पट्टी लगाएं।
  13. रतौंधी एवं श्वासरोग: में हाल की व्याई हुई गाय के 5-6 दिन पश्चात तक के दूध का पीयूष लाभ करता है। इसमें एक चम्मच घी मिलायें।
  14. छाती अथवा हृदय रोग पर: दूध में अर्जुन छाल का चूर्ण एक चम्मच डालकर पिलायें।
  15. पाण्डुरोग, क्षय व संग्रहणी के लिए: लोह के बर्तन में गरम किया हुआ दूध सात दिन तक पिलाएं और पथ्य का पालन करें।
  16. कब्ज: कठोर कब्ज होने पर गर्म गौ दुग्ध के साथ त्रिफला (हर्र बहेड़ा आॅवला) चूर्ण उस 5 ग्राम लेने से मलावरोधक नाशक है। निदोष भी समलेगा। अर्श में भी लाभ होता है।
  17. पेप्टिक अल्सर – अग्नि दुग्ध ब्रण: गौ दुग्ध में गौ घृत या गौ का मक्खन मिलाकर ठंडा करके लें। यह अम्लनाशक का कार्य करता है। और पेट के अन्दर के घाव को ठीक करता है। एक चम्मच मधुयष्टि (जेठू लकड़ी या मुलहटी) साथ में लें।
  18. संग्रहणी का निदान: खाया-पीया बिल्कुल नहीं पचता हो तो 21 किशमिश गौ दूध में औटावें। ठण्डा होने के पश्चात् ये किशमिश खा लें, दूध में शहद मिलाकर पीयें। कुछ ही दिनों में संग्रहणी मिट जायेगी।
  19. निम्न रक्त चाप: से पीड़ित व्यक्ति को गौ दुग्ध में शक्कर व एक चुटकी साधारण नमक मिलाकर लेने से आराम मिलता है।
  20. डिप्थीरिया: सामान्य बोलचाल में इसे हव्वा-डव्वा भी कहा जाता है। बच्चों के लिए यह जानलेवा रोग है। बच्चे की आँखें दम घुटने से बाहर निकल जाती है। दो चम्मच गुनगुने दूध में 1/2 चम्मच घी और और एक चम्मच शहद मिलाकर बच्चे को चटाना शुरू कर दें। गले और सीने की सफाई होते ही बच्चा सुखद श्वास लेने लगेगा। घी से दुगनी मात्रा में शहद लें। गाय का गुनगुना घी बच्चे के सीने, गले पर मलें। इससे कफ पिघलेगा, श्वास नली सहज होगी। सींग (शृंग्य) भस्म देना हितकर है।
  21. कैंसर: गौदुग्ध कैंसर के विषाणुओं को नष्ट करने वाला है। एक अनुभूत प्रयोग के अनुसार श्यामा गौ का दुग्ध और काली तुलसी-जितना ले सकें लिया करें। तुलसी के 70 पत्ते सुबह खाने का विधान हैं।
  22. हिचकी हेतु तथा परिश्रम करके आए आदमी को उबला दूध पिलाने से आराम मिलेगा।
  23. अनेक रोगों से मुक्तिः गौदुग्ध एक कटोरे में लेकर हल्दी डालकर पूरे शरीर पर मालिश कर नहाने से अनेक रोगों से मुक्ति मिलती है एवं चमड़ी गोरी, चमकीली व तेजस्वी बनती है।
  24. प्रसूती स्त्री को कोई भी रोग: गाय के दूध की थुली (दलिया) खाने से प्रसूता स्त्री को कोई भी रोग नहीं होता है।
  25. वात रोग: मिश्रीयुक्त गौ दुग्ध में सोंठ 3-5 ग्राम के साथ गर्म-गर्म पियें।
  26. कफ: गर्म दूध में मिश्री के साथ 4-5 काली मिर्च का पाउडर डालकर दिन में 2-3 बार पिलायें।

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